शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

यमन



राग यमन 

संक्षिप्त  परिचय 

थाट - कल्याण
जाति - सम्पूर्ण
वादी - गंधार
संवादी - निषाद
तीव्र स्वर - मध्यम बाक़ी सभी  स्वर शुद्ध
समय - रात्रि का प्रथम प्रहर
प्रकृति - गंभीर
कई लोग इसे कल्याण  व इमन  भी कहते हैं।


आरोह  -  .नि रे ग म  प ध  नि सां
अवरोह - सां नि ध प म  ग रे सा
पकड़  -   .नि रे ग रे सा, प म  ग रे सा


सुनें विदुषी   प्रभा अत्रे जी  के अलौकिक   स्वर में विलम्बित ख्य़ाल मन तू गा रे हरि नाम , द्रुत में लागी लागी रे हरि  संग प्रीत ये जन्म -जन्म की और अंत में तराना .






चित्र-कैमरे से 

सोमवार, 4 जुलाई 2011

राग सोहनी


पारिजात झरते हैं निःशब्द जिस पहर
गोपियाँ पैर की झांझर उतार दबे पाँव
लौटती हैं रास से
रात समेटती है अपनी ओढ़नी जिस
घड़ी
योगी, उतरता है कोई ध्यान में ,
शिशु कुनमुनाता है नींद में भूख से,
कोयल कुहुकती है नीड़ में भूल से
सूर्य,यात्रा पूर्व करता है गंगा में स्नान
कृष्ण की बाँसुरी को उलाहना दे
राधा कह उठती है -काहे उजाड़ी मोरी नींद ....

मेरे गिर्द…सोहनी ठीक इसी पहर
सजती है...बजती है

संक्षिप्त परिचय राग सोहनी
थाट-मारवा
वादी -धैवत
संवादी -गंधार
जाति-औडव-षाडव
वर्जित स्वर आरोह में -रे,प
अवरोह में वर्जित - पंचम
कोमल स्वर- रे_
तीव्र - म
उत्तरांगवादी राग है
धैवत और गंधार की संगत राग की ख़ास निशानी है
गायन समय -रात्रि का अंतिम प्रहर

आरोह-सा ग(म-तीव्र)ध नि सां
अवरोह-सां नि ध (म-तीव्र) ध ग (म-तीव्र)ग रे_ सा
पकड़-(म-तीव्र) ध नि सां रे सां , सां नि ध (म-तीव्र) ध ग



राग सोहनी सितार पर निखिल बैनर्जी


राग सोहनी में पं कैवल्य कुमार गौरव के स्वर में दो बंदिशें


चित्र-गूगल साभार

रविवार, 21 नवंबर 2010

राग मालकोश


रात के तीसरे पहर पूरी क़ायनात
गुनगुनाती है मालकोशी धुन
चाँद अपने सफ़र में थक कर जिस घड़ी
आसमान के सीने पर सुस्ताता है…

हम उनींदी आँखों
किसी रोज़ जो
उठ पायें नर्म बिस्तर से
तो सुन पायें ...जी जायें…


मालकोश में बाँसुरी पर आलाप -पंडित हरि प्रसाद चौरसिया


बलशाली कर दे मोरा मन
मालकोश में छोटे ख्याल की बंदिश स्वर-सुरेश वाड़कर


संक्षिप्त परिचय- राग मालकोश
थाट- भैरवी
जाति- औडव-औडव
वर्ज्य स्वर- रिषभ,पंचम
वादी स्वर- मध्यम
संवादी- षडज
कोमल स्वर- गंधार,धैवत और निषाद
न्यास के स्वर- सा,_ग,म
गायन समय- रात्रि का तीसरा प्रहर
समप्रकृति राग- चंद्रकोश
मालकोश के स्वरों में मात्र नि स्वर शुद्ध कर देने से यह राग चंद्रकोश बन जाता है ।
इसमें पंचम वर्जित होने के कारण इसे गाते समय तानपूरे के प्रथम तार को मंद्र मध्यम से मिलाते हैं ।
मालकोश गम्भीर और शांत प्रकृति का राग होने के कारण मीड़ प्रधान राग माना जाता है ।
आरोह- सा _ग म ,_ध _नि सां ।
अवरोह- सां _नि _ध म,_ग म _ग सा ।
पकड़- _ध(मंद्र) _नि(मंद्र) सा म , _ग म _ग सा ।

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

बेग़म परवीन सुल्ताना-ठुमरी -तुम राधे बनो श्याम


ये आवाज़ - मानो नदी की कोई महीन धारा, कलकल करती, मधुर ध्वनि से आहिस्ता-आहिस्ता पहाड़ उतर रही हो.... एक तारों भरी रात
मेरी अपनी यादों में सिक्किम की हल्की, पिस्तई तीस्ता सदा हरहराती है या फिर बाणगंगा का धीमा मद्धम बहाव जो पहाड़ी की ओट होते ही कभी कानो तक आता है तो बीच -बीच एकदम से सन्नाटे में सिर्फ एक बूंद के टपकने का सा आभास भर देता है ...जो भी हो ...
आज परिभाषाएँ लिखने का मन नही .सिर्फ सुनने का दिल है .मै मुरीद हूँ । जिन्हें जुड़ाव हो वे भी सुनें -
१९५० में आसाम में जन्मी , पटियाला घराने की पद्मश्री बेग़म परवीन सुल्ताना के अद्भुत स्वरों में ये ठुमरी -
तुम राधे बनो श्याम





चित्र-गूगल साभार

बुधवार, 20 जनवरी 2010

राग बहार-विलायत खाँ साहब-पल्लवी पोटे



राग बहार का संक्षिप्त परिचय -

थाट- काफी
जाति-षाडव-षाडव
स्वर-गंधार कोमल ,दोनों निषादों का प्रयोग ,आरोह में रे ,अवरोह में ध स्वर वर्ज्य
वादी स्वर-म
संवादी स्वर-सा
गायन-वादन समय -मध्य रात्रि
न्यास के स्वर- सा,म और प
सम्प्रकृति राग-मियाँ मल्हार
विशेषता -प्राचीन ग्रंथो में इस राग का उल्लेख नहीं मिलता,अत: यह माना जाता है कि इस राग की रचना मध्य काल में हुई . विद्वान बागेश्वरी ,अड़ाना और मियाँ मल्हार के मिश्रण से इस राग की रचना मानते हैं .इस राग का चलन सप्तक के उत्तर अंग तथा तार सप्तक में होने के कारण इस राग को उत्तरांग प्रधान रागों के अन्तर्गत रखा गया है . बहार राग के गीतों में बसंत ॠतु का वर्णन मिलता है . इस राग का गायन समय मध्य रात्रि है तथापि बसंत ॠतु में इसे हर समय गाया-बजाया जाता है .यह एक चंचल प्रकृति का राग है .
राग बहार
आरोह-सा म , म प ग_ म,ध नि सां ।
अवरोह-सां नि_ प,म प , ग_ म रे सा ।
पकड़-सा म , म प ग_ म , नि_ ध नि सां ।

सुनें बंदिश कलियन संग करता रंगरलियां राग बहार
स्वर-पल्लवी पोटे



एक और प्रस्तुति सितार पे उस्ताद विलायत खाँ साहब


चित्र-साभार

बुधवार, 25 नवंबर 2009

कैसी लगन लागी उन संग/संजीव अभयंकर/जौनपुरी



1-मै ना जानू रे मै ना जानू
कैसी लगन लागी उन संग री मै ना जानु
कछु न कियो बात मै तो उन साथ
जब मिले नैन सो नैन तब लगन लागि उन संग ।


2-मोसे न करो बात
दिखावत मोपे प्रीत औरन को चाहत तुम
कछु न मोहे समुझावो कछु न सुनावो
काहे ऐसी करत प्रीत पिया


संजीव अभयंकर के स्वरों में सुने राग जौनपुरी में दो बंदिशें -मुझे खासतौर से पसंद आते हैं इसमे लिये गये बोल आलाप…




राग जौनपुरी संक्षिप्त परिचय

ग ध नि स्वर कोमल रहे,आरोहन ग हानि ।
ध ग वादी-सम्वादी से,जौनपुरी पहचान ॥

विद्वानो के अनुसार जौनपुर के सुल्तान हुसैन शर्की नें राग जौनपुरी की रचना की थी । इस राग को आसावरी थाट से उत्पन्न माना गया है । राग जौनपुरी में गंधार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं । कुछ गायक कभी-कभी आरोह में शुद्ध नि का भी प्रयोग करते हैं परन्तु प्रचार में कोमल निषाद ही है । जौनपुरी मे आरोह में ग स्वर वर्ज्य है और अवरोह में सातो स्वरों का प्रयोग होता है इसलिये इस राग की जाति षाडव-सम्पूर्ण है । इस राग का वादी स्वर धैवत और सम्वादी स्वर गंधार है । जौनपुरी का चलन अधिकतर सप्तक के उत्तर अंग तथा तार सप्तक में होता है । यह एक उत्तरांगवादी राग है । इसके गायन-वादन का समय दिन का दूसरा प्रहर है । जौनपुरी का समप्रकृति राग आसावरी है ।
आसावरी के स्वर - सा,रे म प,ध_ प म प ग_s रे सा ।
जौनपुरी के स्वर - सा,रे म प, ध_पमप ग_s रे म प ।

जौनपुरी को आसावरी से बचाने के लिये बार-बार रे म प स्वरों का प्रयोग किया जाता है ।

जौनपुरी का आरोह - सा रे म प ध_ नि_ सां ।
अवरोह- सां नि_ ध_ प, म ग_ रे सा ।
पकड़- म प , नि_ ध_ म प ग_s रे म प ।


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बुधवार, 4 नवंबर 2009

अजय पोहंकर-बागेश्री-सखी मन लागे ना


राग बागेश्री कई दिनों से अलग अलग आवाज़ों में सुन रही हूँ ....बार -बार यही ख़्याल आता है -

जो कोई हूक हो "जी" में
तो गूँज उठ्ठेंगे ..
ये बिरही सुर
कोशिशों साधे नहीं जाते....

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सुनें राग बागेश्री में प्रारम्भिक आलाप के बाद दो बंदिशें पं अजय पोहंकर के मनमोहक स्वरों में-
बड़ा ख़्याल-
सखी मन लागे ना
मानत नाहीं मोरा समझाय रही
ना जानूँ बालम मिले कब
याही मन प्रीत लगाय पछताय रही


छोटा ख़्याल
जो हमने तुमसे बात कही
तुम अपने ध्यान में रखियो चतुर सुघर नारी
जबही लाल मिलन को देखे रूठ रही क्यों हमसे प्यारी
कितनी करत चतुराई उनके साथ



सुविधा के लिए दो प्लयेर्स लगा दिए हैं




राग बागेश्री-संक्षिप्त विवरण-

द्वितीय प्रहर निशि गनि मृदु ,मानत मस सम्वाद
आरोहन स्वर रे प वर्जित ,राखत काफी थाट

राग बागेश्री की रचना काफ़ी थाट से मानी गई है । इस राग के आरोह में रे ,प स्वर वर्जित हैं और अवरोह में सातों स्वरों का प्रयोग किया जाता है इस कारण इसकी जाति औडव-सम्पूर्ण है . इसमें वादी स्वर मध्यम और संवादी षडज है । सा ,म , और ध स्वर राग बागेश्री में न्यास के स्वर माने जाते हैं ।
इस राग में सा म , ध म और ध ग_ स्वर संगतियों की प्रचुरता है । इसके गाने - बजाने का समय रात्रि का द्वितीय प्रहर है । बागेश्री से मिलता - जुलता राग, भीमपलासी है उदाहरण नीचे के स्वरों में देखे -
बागेश्री - .ध .नि_ सा म ,म s ग_ , म ग_ रे सा
भीमपलासी - .नि_ सा म ,म प ग_ म , ग_ रे सा

राग बागेश्री का आरोह ,अवरोह ,पकड़
आरोह- .नि_ सा ग_ म ,ध नि_ सां ।
अवरोह- सां नि_ ध ,म प ध ग_ s म ग_ रे सा ।
पकड़ - .ध .नि_ सा म , ध नि_ ध म ,म प ध ग_ ,म ग_ रे सा ।

दूसरा प्लेयर रवी जी के ब्लॉग से


चित्र साभार

सोमवार, 17 अगस्त 2009

धमार/राग मारवा



धमार गायकी का संक्षिप्त परिचय-

धमार भारतीय संगीत का एक अत्यंत प्राचीन अंग है। ऐसी मान्यता है कि पंद्रहवीं शताब्दी के अंत और सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में मानसिंह तोमर और नायक बैजू ने धमार गायकी की नींव डाली। धमार की बंदिश १४ मात्राओं वाली धमार ताल में ही गाई जाती है । इसमें अधिकतर राधा-कृष्ण और गोपियों की होली का वर्णन मिलता है , जिसके कारण बहुत से लोग इसे होली गीत भी कहते हैं । लेकिन, धमार तथा होली विधा में बहुत अन्तर है। इन दोनों की गायन-शैलियाँ अलग-अलग हैं । धमार गीत के बोल ब्रज व हिन्दी भाषा के होते हैं । इसमें श्रृगार रस की प्रधानता रहती है । ध्रुपद गायकी के समान ही धमार में भी गुणीजन नोम-तोम का प्रारम्भिक आलाप करते हैं । धमार गायन में खटके अथवा तान के सामन स्वर समूह लगभग न के बराबर प्रयोग किये जाते हैं । इसमें गीत के बोलों के माध्यम से ही दुगुन,तिगुन,चौगुन,आड़ आदि लयकारियाँ दिखाई जाती हैं । धमार मे मीड़ व गमक का प्रयोग ख़ूब देखने को मिलता है । ध्रुपद व धमार दोनों के ही प्रत्येक अंग में गम्भीरता रक्खी जाती है फिर भी ध्रुपद,धमार से कुछ अधिक गम्भीर होता है । धमार के श्रेष्ठ गायक नारायण शास्री, बहराम खाँ, पं. लक्ष्मणदास, गिद्धौर वाले मोहम्मद अली खाँ, आलम खाँ, आगरे के गुलाम अब्बास खाँ,उस्ताद फैयाज़ खाँ और उदयपुर के डागर बंधु आदि हुए हैं। धमार के साथ पखावज बजाने की परम्परा है परन्तु पखावज के अभाव में तबले के साथ भी संगत की जाती है ।

इसके इलावा ध्रुपद-धमार पे ये लेख नेट पे मिला - यहाँ




सुनें उस्ताद रहीम फ़हीमुद्दीन ख़ाँ डागर साहब के अद्धभुत स्वरों में राग मारवा में निबद्ध आलाप व धमार की ये बंदिश

शनिवार, 9 मई 2009

मोरा संइया बुलावे आधी -राशिद खान-ठुमरी

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राग देश का संक्षिप्त परिचय-
राह देश की उत्त्पत्ति खमाज थाट से मानी गयी है । यह औडव-सम्पूर्ण जाति के रागों के अन्तर्गत आता है कारण इसके आरोह में गंधार तथा धैवत स्वर वर्ज्य हैं अर्थात नहीं प्रयोग किये जाते हैं व अवरोह में सातों स्वरों का प्रयोग होता है । राग देश मे वादी स्वर-रे तथा संवादी स्वर-प हैं ।इस राग का गायन समय रात्रि का दूसरा प्रहर है । राग देश एक चंचल प्रकृति का राग है । अत: इसमें अधिकतर छोटा ख्याल व ठुमरी गाई जाती हैं । इस राग के आरोह में शुद्ध नि व अवरोह में कोमल नि का प्रयोग किया जाता है जैसे-म प नि सां,रें नि_ ध प ,ध म ग रे । राग देश के आरोह में वैसे तो ग , ध स्वर वर्जित हैं परन्तु कभी कभी राग की सुंदरता के लिये इस नियम का उल्लंघन कर ग अथवा ध का प्रयोग मींड व द्रुत स्वरों के रूप में किया जाता है जैसे -रेगम ग रे तथा प धनि ध प । यहां ध नि स्वरों के ऊपर मीड़ का चिन्ह लगाया जाता है । राग देश पूर्वांग प्रधान राग है । इसमें ध म स्वरों की संगती बार-बार दिखाई जाती है । देश से मिलते जुलते रागों में सोरठ व तिलक कामोद आते हैं ।

आरोह-( नि-मन्द्र) सा रे,म प,नि सां ।
अवरोह-सां नि_ध प ,ध म ग रे ,गऽ (नि-मन्द्र) सा ।
पकड़- म प ध ऽ म ग रे,गऽ ( नि-मन्द्र) सा ।



सुनते हैं राग देश में उस्ताद राशिद खान की गाई ये खूबसूरत ठुमरी -मोरा संइया बुलावे आधी रात को नदिया बैरी भयी

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

राग बिहाग-वीणा सहस्त्र बुधे

मजलिस-ए-शाम उठे देर हुई
साज़ मुँह ढाँपके सब सो भी चुके
शामियाने में लटकते हैं अभी रात के जाले
दामन-ए-शब पे लटकता है अभी चाँद का पैवंद

गुलज़ार





राग बिहाग का संक्षिप्त परिचय-
थाट- बिलावल
जाति-औड़व सम्पूर्ण ( आरोह मे में 5 स्वर,अवरोह मे-7 स्वर )
वादी स्वर-गंधार
सम्वादी स्वर-निषाद
गायन समय-रात्रि का प्रथम प्रहर
स्वर-सभी शुद्ध,आरोह में रे,ध वर्ज्य
विवादी स्वर मानकर तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग किया जाता है कभी कभार । कुछ गायक तीव्र" म" का प्रयोग बिल्कुल भी नही करते व इसे शुद्ध बिहाग कहते हैं ।
प्रकृति -बिहाग गम्भीर प्रकृति के रागों मे गिना जाता है ।
चलन- राग का चलन मन्द्र,मध्य तथा तार तीनों सप्तकों में समान रूप से होता है ।
न्यास के स्वर-सा,ग,प और नि
मिलते-जुलते राग-यमन कल्याण

बिहाग की आरोह- नि(मन्द्र) सा ग,म प,नि सां ।

अवरोह-सां नि,ध प,म(तीव्र) प ग म ग,रे सा ।

पकड़-नि(मन्द्र) सा ग म प,म(तीव्र) प ग म ग,रे सा ।




वीणा सहस्त्र बुधे के स्वरो में सुने राग बिहाग - कैसे सुख सोयें बड़ा ख़्याल , ले जा रे जा पथिकवा इतनो संदेसा पिया को छोटा ख़्याल व अन्त में तराना ।

वीणा सहस्त्र बुधे जी की गायकी मुझे यूँ भी बहुत पसंद है । उनके स्वरों में भजन यहाँ सुना जा सकता है ।

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

राग हंसध्वनि-लागी लगन पति सखी संग,-राग हंसध्वनि


एक लम्स
हल्का सुबुक
और फिर लम्स-ए-तवील
दूर उफ़क़ के नीले पानी में उतरे जाते हैं तारों के हुजूम
और थम जाते हैं सय्यारों की गर्दिश के क़दम
ख़त्म हो जाता है जैसे वक़्त का लंबा सफ़र
तैरती रहती है इक ग़ुंचे के होंटों पे कहीं
एक बस निथरी हुई शबनम की बूँद

तेरे होटों का बस इक लम्स-ए-तवील
तेरी बाँहों की बस एक संदली गिरह
गुलज़ार


लम्स-ए-तवील-लम्बा स्पर्श

बहुत कुछ सुना जाता है पर राशिद ख़ां की आवाज़ जब बजती है तो फिर दिनों तक गूँजती है इर्द-गिर्द । न जाने कौन दोस्त/दुश्मन पिरो गया कानों में ये आवाज़ कि अब नशा उतरता नहीं :) …… राग हंसध्वनि मे आज सुनते हैं तीनताल मे निबद्ध छोटा ख्याल -लागी लगन पति सखी संग,परंसुख अति आनंद



राग का संक्षिप्त परिचय
राग हंसध्वनि कनार्टक पद्धति का राग है परन्तु आजकल इसका उत्तर भारत मे भी काफी प्रचार है । इसके थाट के विषय में दो मत हैं कुछ विद्वान इसे बिलावल थाट तो कुछ कल्याण थाट जन्य भी मानते हैं । इस राग में मध्यम तथा धैवत स्वर वर्जित हैं अत: इसकी जाति औडव-औडव मानी जाती है । सभी शुद्ध स्वरों के प्रयोग के साथ ही पंचम रिषभ,रिषभ निषाद एवम षडज पंचम की स्वर संगतियाँ बार बार प्रयुक्त होती हैं । इसके निकट के रागो में राग शंकरा का नाम लिया जाता है । गायन समय रात्रि का द्वितीय प्रहर है ।

आरोह-सा रे,ग प नि सां

अवरोह-सां नि प ग रे,ग रे,नि (मन्द्र) प(मन्द्र) सा ।

पकड़-नि प ग रे,रे ग प रे सा



शनिवार, 1 नवंबर 2008

राग ललित-राशिद ख़ाँ


…डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये चाँद उफ़क़ पर पहुँचे
दिन अभी पानी में हो,रात किनारे के क़रीब
न अँधेरा,न उजाला हो,न ये रात न दिन……


गुलज़ार की इस नज़्म के समय ही बजता है राग ललित। ये तो ख़ैर मेरी अपनी बात है जिसका कोई प्रमाण नही ।
आज सरगम पे सुनते हैं राग ललित मे पहले विलम्बित व बाद में छोटा ख़्याल उस्ताद राशिद ख़ाँ के स्वरों में । पहले राग का संक्षिप्त परिचय --

थाट-मारवा
स्वर-रिषभ कोमल , शुद्ध व तीव्र दोनो मध्यमों का प्रयोग बाकी सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं ।
वर्जित स्वर -पंचम
जाति- षाडव-षाडव
वादी स्वर-मध्यम
संवादी स्वर- षडज
न्यास के स्वर-स,ग,म
गायन-वादन समय-रात्रि का अंतिम प्रहर
राग ललित सन्धिप्रकाश रागो के अन्तर्गत आता है । यह एक गम्भी्र प्रकृति का उत्तरांग प्रधान राग है । इसे गाते व बजाते समय इसका विस्तार मन्द्र व मध्य सप्तकों में अधिक होता है । राग ललित दो मतों से गाया जाता है शुद्ध धैवत व कोमल धैवत परन्तु शु्द्ध धैवत से यह राग अधिक प्रचार में है ।




आरोह-नी (मन्द्र) रे_ ग म,म(तीव्र)म ग,म(तीव्र) ध,सं ।
अवरोह-रें_ नी ध,म(तीव्र) ध म(तीव्र) म ग ,रे स ।
पकड़- नी रे_ ग म ,ध म(तीव्र) ध म(तीव्र) म ग ।

बुधवार, 24 सितंबर 2008

मारू बिहाग -झूला -शुभामुदगल

राग मारू बिहाग के संक्षिप्त परिचय के साथ आज सरगम पर प्रस्तुत हैं शुभा मुद्गल ( मुदगल) के स्वर मे सावनी झूला । झूला ,कजरी आदि विधायें हिन्दुस्तानी संगीत मे उपशास्त्रीय अंग के रूप मे जाने जाते हैं । कजरी के मूलतः तीन रूप हैं- बनारसी, मिर्जापुरी और गोरखपुरी । पं छन्नूलाल मिश्र,शोभा गुर्टू,गिरिजा देवी जैसे दिग्गज ,इस क्षेत्र के जाने माने हस्ताक्षर हैं । कजरी के बोलो मे जहाँ एक ओर नायिका के विरह का वर्णन होता है ,झूला मे वहीं अधिकतर राधा कृष्ण के रास व श्रंगार से संबन्धित बोलों का समावेश होता है ।
राग मारू बिहाग का संक्षिप्त परिचय-

थाट-कल्याण

गायन समय-रात्रि का द्वितीय प्रहर

जाति-ओडव-सम्पूर्ण (आरोह मे रे,ध स्वर वर्जित हैं)

विद्वानों को इस राग के वादी तथा संवादी स्वरों मे मतभेद है-

कुछ विद्वान मारू बिहाग मे वादी स्वर-गंधार व संवादी निषाद को मानते है इसके विपरीत अन्य संगीतज्ञ इसमे वादी स्वर पंचम व संवादी स्वर षडज को उचित ठहराते हैं ।

प्रस्तुत राग मे दोनो प्रकार के मध्यम स्वरों ( शुद्ध म व तीव्र म ) का प्रयोग होता है । शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयुक्त होते हैं ।

मारू बिहाग आधुनिक रागों की श्रेणी मे आता है। इसके रचयिता उ0 स्वर्गीय अल्लादिया खां साहब माने जाते हैं

इस राग के समप्रकृति राग -बिहाग,कल्याण व मार्ग बिहाग हैं ।

मारू बिहाग का आरोह,अवरोह पकड़-

आरोह-नि(मन्द्र) सा म ग,म(तीव्र)प,नि,सां ।

अवरोह-सां,नि ध प,म(तीव्र)ग,म(तीव्र)ग रे,सा ।

पकड़-प,म(तीव्र)ग,म(तीव्र)ग रे,सा,नि(मन्द्र)सा म ग,म(तीव्र)प,ग,म(तीव्र)ग,रे सा ।


रविवार, 14 सितंबर 2008

विचित्र वीणा--यमन

आज सुनते हैं राग यमन विचित्र वीणा पर । वादक हैं कन्नौज के श्री कृष्ण चन्द्र गुप्ता जो आकाशवाणी के बी हाई ग्रेड कलाकार हैं । आपने विचित्र वीणा की शिक्षा पं गोपाल कृष्ण जी से प्राप्त की । इसके इलावा बनारस घराने के पं गणेश प्रसाद जी मिश्र से समय समय पर संगीत के विभिन्न पहलुओं पर मार्ग दर्शन लेते रहे । विचित्रवीणा जैसे कठिन वाद्य को अपने जीवन की पूंजी कहने वाले कृष्ण चन्द्र जी एक सन्दल डिस्टिलेशन मील के मालिक भी हैं । और यह बताते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है कि मेरे जीवन मे जो भी थोड़ी बहुत स्वर सुनने की समझ मैने पायी वो मेरे मामा जी (कृष्ण चन्द्र गुप्ता)के प्यार और दुलार के कारण ही आयी ।
प्राचीनतम शास्त्र वेदों में से सामवेद से वीणाके कई प्रकार उद्भूत माने गये हैं, जिन्हे कई देवी देवता बजाते हैं । इनमे रूद्र वीणा,सरस्वती वीणा,नारदैय वीणा, हनुमत वीणा इत्यादि वीणा के 36 प्रकारों का वर्णन कालान्तर तक मिलता है । विचित्र वीणा उत्तर भारतीय संगीत में वीणा का नवीनतम रूप है । इस वाद्य की गमकदार आवाज़ और अतिसार सप्तक की धारदार आवाज़ दोनों ही वीणा की ध्वन्यात्मक विशेषताये हैं । प्रस्तुत विडियो मे राग यमन मे आलापचारी सुनी जा सकती है । साथ ही यह भी कहना चाहूँगी कि स्वरों के अतिरिक्त मुझे इस दुर्लभ वाद्य के बारे मे खुद कोई खास जानकारी नही है । मामाजी के लेख के आधार पर मै यह विवरण यहाँ दे रही हूँ । ध्येय मात्र इतना है कि इस अद्धभुत वाद्य की जानाकारी सभी लोगों तक पहुँचे ।
पहली बार विडियो अपलोड किया है, साथ ही रिकार्डिग भी पुरानी व घर पर की गयी है । यदि ये प्रयास सफ़ल हुआ तो इसी के दूसरे हिस्से भी पोस्ट करूँगी --



एक बार पूर्ण बफ़रिंग हो जाने के बाद विडियो आसानी से सुना व देखा जा सकता है--

मंगलवार, 1 जुलाई 2008

दरबारी कान्हड़ा--उस्ताद राशिद खाँ

दरबारी कान्हड़ा

राग परिचय- प्राचीन संगीत ग्रन्थों मे राग दरबारी कान्हड़ा के लिये भिन्न नामों का उल्लेख मिलता है । कुछ ग्रन्थों मे इसका नाम कणार्ट,कुछ मे कणार्टकी तो अन्य ग्रन्थों मे कणार्ट गौड़ उपलब्ध है। वस्तुत: कन्हण शब्द कणार्ट शब्द का ही अपभ्रन्श रूप है। कान्हड़ा के पूर्व दरबारी शब्द का प्रयोग मुगल शासन के समय से प्रचलि्त हुआ ऐसा माना जाता है। कान्हड़ा के कुल कुल 18 प्रकार माने जाते हैं- दरबारी,नायकी,हुसैनी,कौंसी,अड़ाना,शहाना,सूहा,सुघराई,बागे्श्री,काफ़ी,गारा,जैजैवन्ती,टंकी,नागध्वनी,मुद्रिक,कोलाहल,मड़ग्ल व श्याम कान्हड़ा। इनमे से कुछ प्रकार आजकल बिलकुल भी प्रचार मे नहीं हैं।
थाट-आसावरी
स्वर-गन्धार,निषाद व धैवत कोमल । शेष शुद्ध स्वरों का प्रयोग्।
जाति-सम्पूर्ण षाडव
वादी स्वर-रिषभ(रे)
सम्वादी स्वर-पंचम(प)
समप्रकृति राग-अड़ाना
गायन समय-रात्रि का द्वितीय प्रहर
विशेषता-यह राग आलाप के योग्य है। पूर्वांग-वादी राग होने के कारण इसका विस्तार अधिकतर मध्य सप्तक मे होता है। दरबारी कान्हड़ा एक गम्भीर प्रकृति का राग है। विलम्बित लय मे इसका गायन बहुत ही सुन्दर लगता है।
आरोह- सा रे ग_s म प ध_- नि_ सां,
अवरोह-सां, ध॒ , नि॒, प, म प, ग॒, म रे सा ।
पकड़-ग॒ रे रे , सा, ध़॒ नि़॒ सा रे सा

आइये सुने राग दरबारी कान्हड़ा मे एक विलम्बित ख्याल - एक ताल मे व द्रुत खयाल तीनताल मे उस्ताद राशिद खाँ की खूबसूरत आवाज़ में-

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साभार-RPG MUSIC

सोमवार, 24 दिसंबर 2007

रागों मे जातियां

वर्ष शेष हो रहा है,लोगों से मिलना जुलना व घूमना फ़िरना इन सभी कारणों से इधर "सरगम" पर कुछ भी लिखा नहीं गया । चलिये आज बात करते है रागों मे प्रयोग होने वाले "जाति " शब्द की । राग विवरण मे सुनते है अमुक राग अमुक जाति का है। "जाति" शब्द राग मे प्रयोग किये जाने वाले स्वरों की संख्या का बोध कराती है । रागों मे जातियां उनके आरोह तथा अवरोह मे प्रयोग होने वाले स्वरों की संख्या पर निर्धारित होती है।

दामोदर पंडित द्वारा रचित संगीत दर्पण मे कहा गया है……

ओडव: पंचभि:प्रोक्त: स्वरै: षडभिश्च षाडवा।
सम्पूर्ण सप्तभिर्ज्ञेय एवं रागास्त्रिधा मत: ॥

अर्थात,जिन रागों मे 5 स्वर प्रयोग होते है वे "ओडव जाति" ,जिन रागों मे 6 स्वर प्रयोग होते हैं वे "षाडव जाति" तथा जिन रागो मे 7 स्वर प्रयोग होते है वे "सम्पूर्ण जाति" के राग कहलाते है। अत: हम देख सकते हैं कि संख्या के आधार पर रागों की मुख्य तीन जातियां होती है-

ओडव जाति= 5 स्वर वाले राग
षाडव जाति = 6 स्वर वाले राग
सम्पूर्ण जाति = 7 स्वर वाले राग

परन्तु अधिकांश रागों के आरोह तथा अवरोह मे समान स्वरों कि संख्या का प्रयोग नही होता, जैसे कुछ रागों के आरोह मे 6 स्वर तथा अवरोह मे 7 स्वर प्रयोग होते है,तो कुछ के आरोह में 5 व अवरोह में 6 अथवा 7 स्वर प्रयोग किये जाते हैं। अब जिन रागों मे आरोह मे 5 व अवरोह मे6 स्वर लगते है उन्हें औडव-षाडवजाति के अन्तर्गत रक्खा जाता है,इसी प्रकार जिन रागो के आरोह मे 5 व अवरोह मे 7 स्वर लगाये जाते है उन्हेऔडव-सम्पूर्णजाति का माना जाता है ।इस प्रकार हम देखते है कि रागों कि मुख्य 3 जातियों से कुल मिलाकर 3* 3 = 9 जातियां बनती हैं ,इनके नाम इस प्रकार हैं………

औडव-औडव- जिनके आरोह मे 5 व अवरोह मे भी 5 स्वर प्रयोग होते हो ।

औडव-षाडव- जिनके आरोह मे 5 व अवरोह मे 6 स्वर प्रयोग होते हो ।

औडव-सम्पूर्ण- जिनके आरोह मे 5 व अवरोह मे 7 स्वर प्रयोग होते हो ।

षाडव-षाडव- जिनके आरोह मे 6 व अवरोह मे भी 6 स्वर प्रयोग होते हो ।

षाडव-औडव - जिनके आरोह मे 6 व अवरोह मे 5 स्वर प्रयोग होते हो ।

षाडव-सम्पूर्ण- जिनके आरोह मे 6 व अवरोह मे 7 स्वर प्रयोग होते हो ।

सम्पूर्ण-सम्पूर्ण - जिनके आरोह मे 7 व अवरोह मे भी 7 स्वर प्रयोग होते हो ।

सम्पूर्ण-षाडव- जिनके आरोह मे 7 व अवरोह मे 6 स्वर प्रयोग होते हो ।

सम्पूर्ण-औडव- जिनके आरोह मे 7 व अवरोह मे 5 स्वर प्रयोग होते हो ।
कुछ रागों की जातियां उनके आरोह अवरोह के आधार पर देखें……

राग भैरव-सम्पूर्ण जाति
आरोह-सा रे_ ग म प ध_ नि सां
अवरो- सां नि ध_ प म ग रे_ सा ।

राग वृन्दावनी सारंग-औडव-औडव जाति
आरोह-नि[mandr] सा,रे म प नि सां
अवरोह-सां,नि_ प,म रे सा ।

राग भीमपलासी-औड्व-सम्पूर्ण जाति
आरोह -नि_[मन्द्र] सा ग_ म प नि_ सां
अवरोह- सां नि_ ध प म ग_ रे सा ।

आइये सुने "अली अकबर खान" द्वारा सरोद पर बजाया, औड्व-सम्पूर्ण जाति का राग भीमपलासी

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सोमवार, 17 दिसंबर 2007

अलंकार

आज चर्चा करते हैं संगीत मे अलंकारों के प्रयोग की । शास्त्रीय गायन तथा वादन के क्षेत्र मे विद्यार्थियों को सर्वप्रथम अलंकारो का अभ्यास करवाया जाता है । { संगीत रत्नाकर } के अनुसार-" विशिष्ट-वर्ण-सन्दर्भमलंकार प्रचक्षते" अर्थात, नियमित वर्ण समूह को अलंकार कहते हैं । सरल शब्दों में, स्वरों के नियमानुसार चलन को अलंकार कहते हैं । अलंकारों को बहुत से लोग " पलटा" भी कहते हैं । वाद्य के विद्यार्थियों को अलंकार के अभ्यास से वाद्य पर विभिन्न प्रकार से उंगलियां घुमाने की योग्यता हासिल होती है वहीं गायन क्षेत्र से जुड़े लोगो को इस के नियमित अभ्यास से कंठ मार्जन मे विशेष सहायता मिलती है।

अलंकारों में कई कडियां होती है,जो आपस में एक दूसरे से जुड़ी रहती हैं । अलंकारों की रचना में- प्रत्येक अलकार मे मध्य सप्तक के { सा} से तार सप्तक के {सां } तक आरोही वर्ण होता है जैसे- "सारेग,रेगम,गमप,मपध,पधनी,धनीसां" व तार सप्तक के {सां} से मध्य सप्तक के { सा} तक अवरोही वर्ण होता है जैसे- "सांनिध,निधप,धपम,पमग,मगरे,गरेसा" । एक अन्य उदाहरण मे आरोही व अवरोही वर्ण साथ मे देखें………

आरोह -सारेगम,रेगमप,गमपध,मपधनि,पधनिसां ।
अवरोह -सांनिधप,निधपम,धपमग,पमगरे,मगरेसा ।

अलंकारों का गायन किस प्रकार करते है, सुनिये मेरा एक प्रयास ……।

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मंगलवार, 11 दिसंबर 2007

हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया…राग बागेश्री

भारतीय शास्त्रीय संगीत की मेरी पिछ्ली पोस्ट पर सभी मित्रों के उपयोगी सुझाव,सराहनाओं व बहुमूल्य टिप्पणियों से इस प्रयास को बहुत बल मिला है। आप सबका बहुत बहुत आभार ।जैसा की सब चाहते हैं ……तो आज रागों मे प्रयोग होने बाले बेसिक शब्दों की परिभाषाओं की सर्वप्रथम चर्चा करते हैं । जिनसे रागों का संक्षिप्त परिचय समझनें मे सुविधा होगी । यहां ये कहना ज़रूरी है कि कुछ परिभाषायें ऐसी हैं जिनके बारे मे विस्तार से लिखा जाये तो एक ही विषय कयी कयी दिनों तक चलेगा और पढ़ने वाले भी ऊब महसूस करेंगे इसलिये सरल ढग से इन्हें सामने रखने का प्रयास कर रही हूं ।
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स्वर-गायन एवं वादन में सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है ,स रे ग म प ध नी । इनमें से 4 स्वर-रे ग ध नी शुद्ध होने के साथ साथ कोमल भी प्रयोग किये जाते हैं,1 स्वर "म" शुद्ध होने के साथ साथ तीव्र भी प्रयोग किया जाता है परन्तु षडज व पंचम यानी "सा व प" सदैव शुद्ध ही प्रयोग किये जाते हैं । स्वर 2 प्रकार के होते हैं -शुद्ध स्वर व विकृत स्वर। शुद्ध स्वर वे स्वर कहलाते हैं जो अपने निश्चित स्थान पर गाये या बजाये जाते हैं । विकृत स्वर वे हैं जो अपने स्थान से कुछ ऊपर चढ्कर या नीचे उतर कर प्रयोग किये जाते हैं । विकृत स्वर दो प्रकार के होते हैं-
कोमल विकृत-जब कोई स्वर अपने स्थान से नीचे प्रयोग किया जाये तो कोमल स्वर कहलाता है और उस स्वर के नीचे _प्रकार का चिन्ह लगाया जाता है।जैसे राग बागेश्वरी की आरोह में-स नी_ ध नी_ स,म ग_ म ध नी सं । यहां निषाद व गंधार कोमल प्रयोग किये गये हैं ।

तीव्र विकृत-जब कोई स्वर अपने स्थान से थोड़ा ऊपर चढ़ा कर गाया या बजाया जाता है तो वह तीव्र विकृत कहलाता है जैसे राग यमन मे "म" का प्रयोग हुआ है-नि[मन्द्र}रे ग,मे प ध नी सां। तीव्र स्वरो को दिखाने के लिए इस \ प्रकार के चिन्ह का प्रयोग स्वर के उपर किया जाता है ।नीचे मै गा कर कुछ स्पष्ट करने का प्रयास करती हूं -

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मन्ना डे नहीं।आइये सुने राग बागेश्री पर आधारित तलत महमूद द्वारा गाया ये गीत

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चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

सोमवार, 10 दिसंबर 2007

टेस्ट पोस्ट

,कृपया यहाँ क्लिक ना करे।यह टेस्ट पोस्ट है ।
मेरे द्वारा रचित
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