आज चर्चा करते हैं संगीत मे अलंकारों के प्रयोग की । शास्त्रीय गायन तथा वादन के क्षेत्र मे विद्यार्थियों को सर्वप्रथम अलंकारो का अभ्यास करवाया जाता है । { संगीत रत्नाकर } के अनुसार-" विशिष्ट-वर्ण-सन्दर्भमलंकार प्रचक्षते" अर्थात, नियमित वर्ण समूह को अलंकार कहते हैं । सरल शब्दों में, स्वरों के नियमानुसार चलन को अलंकार कहते हैं । अलंकारों को बहुत से लोग " पलटा" भी कहते हैं । वाद्य के विद्यार्थियों को अलंकार के अभ्यास से वाद्य पर विभिन्न प्रकार से उंगलियां घुमाने की योग्यता हासिल होती है वहीं गायन क्षेत्र से जुड़े लोगो को इस के नियमित अभ्यास से कंठ मार्जन मे विशेष सहायता मिलती है।
अलंकारों में कई कडियां होती है,जो आपस में एक दूसरे से जुड़ी रहती हैं । अलंकारों की रचना में- प्रत्येक अलकार मे मध्य सप्तक के { सा} से तार सप्तक के {सां } तक आरोही वर्ण होता है जैसे- "सारेग,रेगम,गमप,मपध,पधनी,धनीसां" व तार सप्तक के {सां} से मध्य सप्तक के { सा} तक अवरोही वर्ण होता है जैसे- "सांनिध,निधप,धपम,पमग,मगरे,गरेसा" । एक अन्य उदाहरण मे आरोही व अवरोही वर्ण साथ मे देखें………
आरोह -सारेगम,रेगमप,गमपध,मपधनि,पधनिसां ।
अवरोह -सांनिधप,निधपम,धपमग,पमगरे,मगरेसा ।
अलंकारों का गायन किस प्रकार करते है, सुनिये मेरा एक प्रयास ……।
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सोमवार, 17 दिसंबर 2007
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5 टिप्पणियां:
बहुत जबर्दस्त काम कर रहे हैं आप.
आपकी यह कक्षा हमें बड़ी अच्छी लगी। हमें भी अपनी कक्षा में शामिल करें..
मैने आपकी इस सरगम के लिंक को अपनी गीतों की महफिल के साईडबार में लगाया है।
बहुत सार्थक प्रयास कर रहीं हैं आप पारुल जी. बहुत अच्छा लग रहा है सीख कर. हमारे जैसे बे सुरे लोग भी शायद कभी सुर में बोलने लग जायें.
नीरज
neeraj ji, maithly ji aap sabkaa bahut aabhaar.....sagar ji aapka bahut swaagat hai...bahut aabhaar
अच्छा लगा आपके द्बारा अलंकारों का गायन
आप प्रयास सराहनीय है ...कृपया इस क्रम को जारी रखने का प्रयास करें
हम सभी को इससे बहुत लाभ मिलता हैं
सादर धन्यवाद ...
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